थाली, डोल बजाकर विपदा को भगाने का बार्सो पुराना लाजिक ""कोरोना"" वायरस के खिलाफ जनता एकजुट।

अजमेर 22 मार्च 20। देश में कोरोना वायरस को भगाने में देश वासियों की एकजुटता आज एक मिसाल बन गई, सभी ने शाम 5 बजे अपने घर से बाहर निकल कर बालकनी, छत , आँगन में आकर थाली, डोल आदि बजाई, कई जगह पटाखे भी छोडे गये। पत्रकार कालोनी कोटडा अजमेर में भी थाली बजा कर जन जागृति उत्त्पन्न करते हुए " कोरोना" से लडने वालों का हौसला बढ़ाते लोग नजर आये। आज की इस घटना पर एक इतिहासिक बात मुझे याद आई है, उसका ज़िक्र करना वाजिब होगा । 50 साल पहले जब आकाश में बादल गरजे बिजली कडती थी तो हमारे दादा-दादी हाहा--हाहा, होहो-हो-हो की जोर जोर की आवाज निकलने के साथ तालियां बजाते थे, उनका कहना था कि इससे बिजली नहीं गिरेगी और वापस आकाश में भाग जाती है, दादा दादी को देख कर उस मौहल्ले में रहने वाले और लोग भी आवाज से आवाज मिलाते थे, तब हम आशा ग॔ज अजमेर के उस स्थान पर रहते थे जहां आज सन्त कवंरराम स्कूल चल रहा है, यहां सिर्फ हमारा ही एक खेत भी था और उसमें कुआं भी। शायद वो कुआ आज भी स्कूल में है। इस मौहल्ले में हमारे परिवार के अलावा लगभग 20-25 स्वजातीय परिवार रहते थे, न जाने क्या कारण रहे वो जगह बुर्जगों ने खाली कर सदी और पिछे पढी सरकारी जमीन पर मकान बनाये बाद में सरकार ने पट्टे जारी किये, और खाली की गई जमीन पर स्कूल बन गया। यह एक बुर्जगों का लोजिक हुआ करता था विपति को भगाने का। आज दिन भर लोग घरों में रहे, और शाम पांच बजे जोर शौर से ""कोरोना"" को भगाने का प्रयास किया है, विश्वास के साथ कह सकते है सम्भवत: हम अवश्य कोरोना को जीत लेगें, घाटियां ऐसे सुनाई दी जैसे स्कूल के बच्चों की छुटियां हुई। "